एक अध्यापक शिक्षार्थियों के भाषा के श्रवण कौशलों का विकास कैसे कर सकता है ?
2023
एक अध्यापक शिक्षार्थियों के भाषा के श्रवण कौशलों का विकास कैसे कर सकता है ?
- A.
शिक्षार्थियों को वह सब सुनने के लिए कहना जिसे वे निष्क्रिय होकर सुनते हैं।
- B.
शिक्षार्थियों से कक्षा में और कक्षा के बाहर सतत रूप से बात करके।
- C.
अन्य भाषिक कौशलों को सम्बद्ध किए बिना केवल श्रवण कौशलों पर ध्यान केन्द्रित करना।
- D.
शिक्षार्थियों के लिए ऐसे अवसर सृजित करना जिनमें वे तरह-तरह के भाषा स्रोतों और लोगों से सुन सकें और अन्य श्रवण संबंधी गतिविधियों में संलग्न हो सकें।
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Correct answer: D
भाषा-शिक्षणशास्त्र में, विशेषतः कम्युनिकेटिव लैंग्वेज टीचिंग (सीएलटी) के अंतर्गत, श्रवण को एक सक्रिय कौशल के रूप में विकसित किया जाता है। इसके लिए शिक्षार्थियों को प्रामाणिक और विविध इनपुट—जैसे विभिन्न वक्ताओं, उच्चारण-शैलियों, पाठ-प्रकारों और संदर्भों—से बार-बार परिचित कराना तथा ऐसे उद्देश्यपूर्ण कार्य कराना आवश्यक है जिनमें उन्हें सुनी हुई सामग्री का अर्थ-संसाधन करना पड़े; न कि केवल निष्क्रिय रूप से सुनना, शिक्षक-प्रधान वार्ता पर निर्भर रहना अथवा किसी एक कौशल पर अलग से ध्यान केंद्रित करना।
वर्णित रणनीति शिक्षार्थियों को भाषा के विविध स्रोतों और विभिन्न व्यक्तियों को सुनने तथा श्रवण से संबंधित आगे की गतिविधियों में भाग लेने के अवसर प्रदान करती है। यह सीधे सीएलटी के सिद्धांत के अनुरूप है: विविध इनपुट से शिक्षार्थियों में विभिन्न वक्ताओं और भाषा-रजिस्टरों को समझने की क्षमता विकसित होती है तथा संबद्ध गतिविधियाँ उन्हें निष्क्रिय ग्रहण से सक्रिय श्रवण-बोध की ओर ले जाती हैं; इसी प्रक्रिया से यह कौशल वास्तव में विकसित होता है।
किसी संबद्ध कार्य के बिना केवल वही सुनना जो पहले से सुनाई दे रहा है, शिक्षार्थियों को निष्क्रिय श्रोता बनाए रखता है; इसलिए उनमें सक्रिय अर्थ-संसाधन का कौशल विकसित नहीं होता।
कक्षा के भीतर और बाहर शिक्षक का निरंतर बोलते रहना शिक्षक को एकमात्र वक्ता के रूप में केंद्र में रखता है। इससे श्रवण-कौशल के लिए आवश्यक विविध इनपुट के स्थान पर केवल एक ही स्वर के प्रति एकदिशीय श्रवण-अनुभव विकसित होता है।
अन्य भाषा-कौशलों से अलग करके केवल श्रवण पर ध्यान केंद्रित करना भाषा-अधिगम के समेकित-कौशल दृष्टिकोण की उपेक्षा करता है, जिसमें श्रवण-कौशल बोलने, पढ़ने और लिखने के अभ्यास को सुदृढ़ करता है तथा स्वयं भी इन अभ्यासों से सुदृढ़ होता है।
अतः श्रवण-संबंधी गतिविधियों के साथ विविध श्रवण-अवसर उपलब्ध कराना ही वह रणनीति है जो शिक्षार्थियों के श्रवण-कौशल का विकास करती है।