गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?
2026
गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?
Answer: C. नागरिकता और सदाचार दोनों मिलकर व्यक्ति को समाजोपयोगी बनाते हैं — अवधारणा: किसी गद्यांश का "निष्कर्ष" वह कथन होता है जो पूरे गद्यांश के केंद्रीय भाव को समेट ले। कोई कथन निष्कर्ष तभी बनता है जब वह तीनों कसौटियों पर खरा उतरे —…
- A.
नागरिकता केवल राज्य से जुड़ा औपचारिक संबंध है
- B.
झूठ, चोरी, अत्याचार दुराचार के अंग हैं
- C.
नागरिकता और सदाचार दोनों मिलकर व्यक्ति को समाजोपयोगी बनाते हैं
- D.
मनुष्य का जीवन संन्यास और सांसारिकता के बीच फँसा हुआ है
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Correct answer: C
अवधारणा: किसी गद्यांश का "निष्कर्ष" वह कथन होता है जो पूरे गद्यांश के केंद्रीय भाव को समेट ले। कोई कथन निष्कर्ष तभी बनता है जब वह तीनों कसौटियों पर खरा उतरे —
व्यापकता: वह गद्यांश की सभी प्रमुख विचार-धाराओं को समाहित करे, किसी एक अंश या उदाहरण तक सीमित न रहे।
आधार: वह गद्यांश में कही गई बात से ही निकले, बाहर से जोड़ा हुआ विचार न हो।
परिमाण: वह गद्यांश के दायरे से न संकुचित हो और न उससे अधिक व्यापक।
प्रयोग: इसी कसौटी पर दिए गए गद्यांश को क्रमशः देखिए —
गद्यांश की पहली विचार-धारा नागरिकता की है — नागरिकता को नागरिक के कर्तव्यों और अधिकारों की समष्टि कहा गया है, और यह बताया गया है कि इसके अभाव में मनुष्य न तो समाज का आवश्यक अंग बन पाता है और न राज्य का। अर्थात् नागरिकता ही मनुष्य को "नागरिक" बनाती है।
दूसरी विचार-धारा सदाचार की है — समाज को व्यवस्थित तथा मर्यादित रखने के लिए सदाचार आवश्यक बताया गया है; झूठ, चोरी और अत्याचार का त्याग इसीलिए ज़रूरी है कि इनसे समाज में अव्यवस्था उत्पन्न होती है और उसका ढाँचा लड़खड़ा जाता है।
गद्यांश का अंतिम वाक्य दोनों धाराओं को एक ही बिंदु पर मिला देता है — समाज उन्हीं गुणों का आदर-सम्मान करता है जो सामाजिक विधियों को दृढ़ बनाने में तथा "बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय" कार्यों में सहायक होते हैं। दोनों का साझा लक्ष्य व्यक्ति को समाज के लिए उपयोगी बनाना है।
अतः दोनों धाराओं को समेटने वाला कथन ही पूरे गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष है — नागरिकता और सदाचार दोनों मिलकर व्यक्ति को समाजोपयोगी बनाते हैं।
परख: शेष कथनों को उसी कसौटी पर जाँचिए —
"नागरिकता केवल राज्य से जुड़ा औपचारिक संबंध है" — गद्यांश नागरिकता को कर्तव्य-अधिकार की समष्टि कहकर समाज और राज्य दोनों से जोड़ता है, इसलिए यह कथन गद्यांश के दायरे से संकुचित है।
"झूठ, चोरी, अत्याचार दुराचार के अंग हैं" — यह सदाचार वाली धारा के भीतर का एक सहायक विवरण है और नागरिकता वाली धारा को छूता ही नहीं, इसलिए यह पूरे गद्यांश का निष्कर्ष नहीं बनता।
"मनुष्य का जीवन संन्यास और सांसारिकता के बीच फँसा हुआ है" — गद्यांश में पशुवत् जीवन और विरागी संन्यासी की चर्चा केवल यह दिखाने के लिए है कि नागरिकता के अभाव में जीवन का स्वरूप कैसा हो जाता है; जीवन के "फँसे" होने का दावा वहाँ है ही नहीं।
परिणाम: गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष है — "नागरिकता और सदाचार दोनों मिलकर व्यक्ति को समाजोपयोगी बनाते हैं।"