निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प…

2021

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए :

घायल बाज़ फिर उड़ना चाहता था। उसने किसी तरह साहस बटोरकर उड़ान भरी और थोड़ी देर पंख फड़फड़ाकर उड़ने के बाद नीचे गिर गया। साँप ने भी ऊँचाई पर बने अपने खोखल से निकलकर अपने को आसमान में छोड़ दिया और नीचे जा गिरा। साँप कहने लगा –

“सो उड़ने का यही आनंद है – भर पाया मैं तो! पक्षी भी कितने मूर्ख हैं। धरती के सुख से अनजान रहकर आकाश की ऊँचाइयों को नापना चाहते थे। किंतु अब मैंने जान लिया कि आकाश में कुछ नहीं रखा। केवल ढेर-सी रोशनी के सिवा वहाँ कुछ भी नहीं, शरीर को सँभालने के लिए कोई स्थान नहीं, कोई सहारा नहीं। फिर वे पक्षी किस बूते पर इतनी डींगें हाँकते हैं, किसलिए धरती के प्राणियों को इतना छोटा समझते हैं। अब मैं कभी धोखा नहीं खाऊँगा, मैंने आकाश देख लिया और खूब देख लिया। बाज़ तो बड़ी-बड़ी बातें बनाता था, आकाश के गुण गाते थकता नहीं था। उसी की बातों में आकर मैं आकाश में कूदा था। ईश्वर भला करे, मरते-मरते बच गया। अब तो मेरी यह बात और भी पक्की हो गई है कि अपनी खोखल से बड़ा सुख और कहीं नहीं है। धरती पर रेंग लेता हूँ, मेरे लिए यह बहुत कुछ है। मुझे आकाश की स्वच्छंदता से क्या लेना-देना? न वहाँ छत है, न दीवारें हैं, न रेंगने के लिए ज़मीन है। मेरा तो सिर चकराने लगता है। दिल काँप-काँप जाता है। अपने प्राणों को खतरे में डालना कहाँ की चतुराई है?”

साँप सोचने लगा कि बाज़ अभागा था जिसने आकाश की आज़ादी को प्राप्त करने में अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी।

किंतु कुछ देर बाद साँप के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उसने सुना, चट्टानों के नीचे से एक मधुर, रहस्यमय गीत की आवाज़ उठ रही है। पहले उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। किंतु कुछ देर बाद गीत के स्वर अधिक साफ़ सुनाई देने लगे। वह अपनी गुफा से बाहर आया और चट्टान से नीचे झाँकने लगा। सूरज की सुनहरी किरणों में समुद्र का नीला जल झिलमिला रहा था। लोग मिलकर गा रहे थे –

“ओ निडर बाज़! शत्रुओं से लड़ते हुए तुमने अपना कीमती रक्त बहाया है। पर वह समय दूर नहीं है, जब तुम्हारे खून की एक-एक बूँद ज़िंदगी के अँधेरे में प्रकाश फैलाएगी और साहसी, बहादुर दिलों में स्वतंत्रता और प्रकाश के लिए प्रेम पैदा करेगी।

तुमने अपना जीवन बलिदान कर दिया किंतु फिर भी तुम अमर हो। जब कभी साहस और वीरता के गीत गाए जाएँगे, तुम्हारा नाम बड़े गर्व और श्रद्धा से लिया जाएगा।”

“भर पाया मैं तो ......” साँप के इस कथन का आशय है –

Answer: B. मन भर गया, अब नहीं उड़ूँगा।संकल्पना किसी कथन का ‘आशय’ उसके शब्दों के शाब्दिक अर्थ से नहीं, बल्कि उसके मुहावरेदार अर्थ और उस प्रसंग से तय होता है जिसमें वह कहा गया है। ‘भर पाना’ अथवा ‘मन…

  1. A.

    देख लिया, अब नहीं देखूँगा।

  2. B.

    मन भर गया, अब नहीं उड़ूँगा।

  3. C.

    आनंद आ गया, अब बैठा रहूँगा।

  4. D.

    समझ गया, अब धोखा नहीं खाऊँगा।

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Correct answer: B

संकल्पना

किसी कथन का ‘आशय’ उसके शब्दों के शाब्दिक अर्थ से नहीं, बल्कि उसके मुहावरेदार अर्थ और उस प्रसंग से तय होता है जिसमें वह कहा गया है। ‘भर पाना’ अथवा ‘मन भर जाना’ का अर्थ है — जी भर जाना, तृप्त या ऊब जाना, अब और की इच्छा शेष न रहना। अतः ऐसे प्रश्न में पहले वाक्यांश का मुहावरेदार अर्थ पकड़िए, फिर देखिए कि वक्ता उसे किस क्रिया या अनुभव के तुरंत बाद कह रहा है।

प्रसंग में प्रयोग

  1. साँप यह कथन ठीक उस क्षण कहता है जब वह अपने ऊँचे खोखल से आसमान में छलाँग लगाकर नीचे गिर चुका है — अर्थात् जिस अनुभव की बात हो रही है, वह ‘उड़ान’ है।

  2. पूरा वाक्य है — “सो उड़ने का यही आनंद है – भर पाया मैं तो!” यहाँ ‘भर पाया’ सीधे ‘उड़ने’ से जुड़ा है, किसी अन्य क्रिया से नहीं।

  3. ‘भर पाया मैं तो’ का मुहावरेदार अर्थ है — मेरा जी भर गया, मन भर गया; इस अनुभव से अब तृप्ति भी है और ऊब भी।

  4. इसके तुरंत बाद साँप कहता है कि ‘अपनी खोखल से बड़ा सुख और कहीं नहीं है’ तथा ‘मुझे आकाश की स्वच्छंदता से क्या लेना-देना?’ — अर्थात् वह उड़ान को दोहराने से इनकार कर रहा है।

  5. इस प्रकार वाक्यांश का आशय बनता है — मन भर गया, अब नहीं उड़ूँगा।

अन्य पाठों से तुलना

  • ‘देख लिया, अब नहीं देखूँगा’ — यह देखने की क्रिया की समाप्ति कहता है; साँप ने ‘मैंने आकाश देख लिया’ अवश्य कहा है, किंतु ‘भर पाया मैं तो’ वाक्यांश उड़ान के अनुभव से जुड़ा है, देखने से नहीं।

  • ‘आनंद आ गया, अब बैठा रहूँगा’ — यह सच्चा सुख मिल जाने की बात कहता है; गद्यांश में ‘आनंद’ शब्द व्यंग्य में आया है, क्योंकि आगे साँप सिर चकराने और दिल काँपने की चर्चा करता है।

  • ‘समझ गया, अब धोखा नहीं खाऊँगा’ — यह साँप के अलग वाक्य ‘अब मैं कभी धोखा नहीं खाऊँगा’ का आशय है, पूछे गए वाक्यांश ‘भर पाया मैं तो’ का नहीं।

निष्कर्ष

“भर पाया मैं तो ......” कहकर साँप यह जताता है कि उड़ान के अनुभव से उसका मन भर चुका है और अब वह दोबारा नहीं उड़ेगा।

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