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2024
निर्देश : नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए :
साहित्य सदैव समाज को निरंतरता प्रदान करता है। यह साहित्य और समाज का गहरा संबंध ही है कि साहित्य में समाज के विश्रृंखलित होते सिद्धांतों और टूटते-बिखरते मूल्यों की चिंता बराबर बनी रहती है। वही साहित्य कालों के बंधन को तोड़कर, उसकी सीमाओं से परे जाकर कालजयी बन पाता है, जिसमें मानवीय सत्य की व्याख्या हो और संवेदनाओं के सहारे आस्था जगाने का प्रयास हो। समय-समय पर साहित्यकारों ने समाज के बदतर होने की स्थिति को पहचाना है। कुछ रचनाकार हमारे साहित्य पटल पर ऐसी गहरी छाप छोड़ जाते हैं, जिनकी आवश्यकता हर युग में बनी रहती है, जिनके विचार सदैव तरोताज़ा ही रहते हैं और जिनकी रचनाएँ समाज को दीप्त करने का दायित्व निभाती चलती हैं। उनका साहित्यकार व्यक्तित्व केवल समस्याओं को ही नहीं परखता बल्कि मनुष्यता में विश्वास को बचाए रखने की कोशिश करता है।
'विश्रृंखलित' में प्रत्यय है :
Answer: C. इत — प्रत्यय (suffix) वे शब्दांश हैं जो किसी मूल शब्द (धातु/संज्ञा) के अंत में जुड़कर नया शब्द बनाते हैं और उसका अर्थ या रूप बदल देते हैं। संस्कृत-मूल शब्दों में…
- A.
लित
- B.
त
- C.
इत
- D.
खलत
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Correct answer: C
प्रत्यय (suffix) वे शब्दांश हैं जो किसी मूल शब्द (धातु/संज्ञा) के अंत में जुड़कर नया शब्द बनाते हैं और उसका अर्थ या रूप बदल देते हैं। संस्कृत-मूल शब्दों में 'इत' एक सुप्रचलित कृदंतीय प्रत्यय है, जो किसी पूर्ण संज्ञा/विशेषण मूल शब्द के बाद जुड़कर नया विशेषण बनाता है — जैसे चर्चा→चर्चित, प्रभाव→प्रभावित, संबंध→संबंधित।
'विश्रृंखलित' शब्द का विश्लेषण करने पर यह वि (उपसर्ग) + श्रृंखल (मूल शब्द, शृंखला अर्थात कड़ी/क्रम से संबंधित) + इत (प्रत्यय) में विभाजित होता है। पूर्ण मूल शब्द 'श्रृंखल' के बाद 'इत' जोड़ने पर 'श्रृंखलित' और उपसर्ग 'वि' लगाने पर 'विश्रृंखलित' (अर्थात क्रम/शृंखला से रहित, बिखरा हुआ) शब्द बनता है — जो गद्यांश के 'टूटते-बिखरते मूल्यों' प्रसंग से भी मेल खाता है। अतः इस शब्द में प्रयुक्त प्रत्यय 'इत' है।
यही 'इत' प्रत्यय अन्य समरूप शब्दों में भी देखा जा सकता है, जैसे प्रचलित (प्रचल+इत), चर्चित (चर्चा+इत) और संबंधित (संबंध+इत), जो इस विश्लेषण की पुष्टि करते हैं। शेष विकल्पों की जाँच करने पर:
'लित': इसमें मूल शब्द 'श्रृंखल' का अंतिम व्यंजन 'ल' प्रत्यय में सम्मिलित हो जाता है, जिससे यह मूल शब्द और प्रत्यय के बीच सही विभाजन नहीं दर्शाता — यह हिंदी में एक स्वतंत्र मान्य प्रत्यय नहीं है।
'त': इसमें केवल अकेला व्यंजन 'त' लिया गया है और साथ लगा स्वर 'इ' न तो मूल शब्द में और न ही प्रत्यय में गिना जाता, जिससे यह यहाँ जुड़े पूर्ण प्रत्यय को सही रूप से नहीं दर्शाता।
'खलत': शब्द 'विश्रृंखलित' की वास्तविक वर्तनी में इस स्थान पर एक स्वर-चिह्न (ि) भी सम्मिलित है, जिसे 'खलत' छोड़ देता है — अतः यह शब्द के अंत के सही अक्षर-क्रम (खलित) से मेल नहीं खाता, और साथ ही मूल शब्द 'श्रृंखल' के भीतर से भी अतिक्रमण करता है।
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