‘बोरौं सबै रघुवंश कुठार की धार में बारन बजि सरत्थहिं । बान की वायु उड़ाव के…

2016

‘बोरौं सबै रघुवंश कुठार की धार में बारन बजि सरत्थहिं ।
बान की वायु उड़ाव के लच्छन लच्छ करौं अरिहा समरत्थहिं ।।’

इन काव्य पंक्तियों में कौन-सा रस है ?

Answer: A. रौद्र रससंकल्पनाकाव्य पढ़ने या सुनने पर पाठक के हृदय में जो आनंदात्मक अनुभूति जागती है, वही रस कहलाती है। प्रत्येक रस के मूल में एक स्थायी भाव होता है, जो विभाव…

  1. A.

    रौद्र रस

  2. B.

    भयानक रस

  3. C.

    वीभत्स रस

  4. D.

    वीर रस

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Correct answer: A

संकल्पना

काव्य पढ़ने या सुनने पर पाठक के हृदय में जो आनंदात्मक अनुभूति जागती है, वही रस कहलाती है। प्रत्येक रस के मूल में एक स्थायी भाव होता है, जो विभाव (आलंबन तथा उद्दीपन), अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होकर रस का रूप ले लेता है।

इसलिए रस पहचानने का नियम यह है — पंक्तियों में जो स्थायी भाव प्रधान रूप से पुष्ट हो रहा हो, उसी के अनुसार रस निश्चित होता है; गौण रूप से आया कोई दूसरा भाव रस का निर्णायक नहीं होता।

प्रयोग

प्रस्तुत पंक्तियाँ परशुराम की उक्ति हैं, जो लक्ष्मण के व्यंग्य-वचनों से उत्तेजित होकर समूचे रघुवंश को ललकारते हैं। इनका विश्लेषण क्रमशः इस प्रकार है —

  1. आलंबन विभाव — लक्ष्मण तथा समस्त रघुवंश, जिनके प्रति वक्ता का भाव जाग्रत हो रहा है।

  2. उद्दीपन विभाव — लक्ष्मण के उपहासपूर्ण वचन तथा वक्ता के हाथ में फरसे-धनुष की उपस्थिति, जो भाव को और भड़काते हैं।

  3. अनुभाव — ‘बोरौं सबै रघुवंश कुठार की धार में’ जैसी संहार की घोषणा, ललकार तथा शस्त्र-प्रदर्शन।

  4. संचारी भाव — अमर्ष, गर्व, उग्रता और आवेग।

  5. स्थायी भाव — इन सबके योग से जो भाव पुष्ट हो रहा है, वह क्रोध है।

क्रोध स्थायी भाव के परिपाक से जो रस निष्पन्न होता है, वह रौद्र रस कहलाता है; अतः इन काव्य पंक्तियों का रस रौद्र रस है।

विभेदक जाँच

शेष विकल्पों के स्थायी भाव इन पंक्तियों में पुष्ट नहीं होते —

रस

स्थायी भाव

इन पंक्तियों में जाँच

रौद्र रस

क्रोध

शत्रु के प्रति ललकार और संहार की धमकी से यह भाव पूर्णतः पुष्ट होता है

भयानक रस

भय

वक्ता स्वयं भयभीत नहीं है; वह भय उत्पन्न करने वाला पक्ष है

वीभत्स रस

जुगुप्सा

रक्त-मांस अथवा किसी घृणोत्पादक दृश्य का वर्णन यहाँ है ही नहीं

वीर रस

उत्साह

आत्म-प्रशंसा अवश्य है, किंतु वह क्रोध से उपजी है; उत्साह यहाँ गौण है

जहाँ युद्धवीर की उमंग प्रधान होती है वहाँ वीर रस माना जाता है, किंतु यहाँ प्रेरक भाव शत्रु के प्रति क्रोध है — इसी कारण परंपरागत हिंदी काव्यशास्त्र इन पंक्तियों में रौद्र रस को प्रधान मानता है।

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