गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक का चयन कीजिए।
2026
गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक का चयन कीजिए।
Answer: A. संवदिया — संकल्पना: शीर्षक गद्यांश का सबसे संक्षिप्त सार होता है। उपयुक्त शीर्षक वही होता है जो गद्यांश के केंद्रीय विषय अथवा मूल चिंता को अपने भीतर समेट ले। शीर्षक…
- A.
संवदिया
- B.
बड़ी बहू
- C.
हवेली
- D.
डाकिया
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Correct answer: A
संकल्पना: शीर्षक गद्यांश का सबसे संक्षिप्त सार होता है। उपयुक्त शीर्षक वही होता है जो गद्यांश के केंद्रीय विषय अथवा मूल चिंता को अपने भीतर समेट ले।
शीर्षक किसी व्यक्ति, स्थान अथवा वस्तु के नाम पर भी हो सकता है — शर्त इतनी है कि पूरा गद्यांश उसी के इर्द-गिर्द घूमे। कसौटियाँ दो हैं — व्यापकता (पूरा गद्यांश उसके अंतर्गत आ जाए) तथा केंद्रीयता (गद्यांश का सूत्र-प्रश्न उसी से जुड़ा हो)। जो तत्त्व गद्यांश में केवल प्रसंगवश अथवा पृष्ठभूमि के रूप में आया हो, वह इन कसौटियों पर संकुचित पड़ता है — चाहे उसका उल्लेख कई बार हुआ हो।
प्रयोग: इस गद्यांश को इन्हीं दो कसौटियों पर तौलिए —
गद्यांश का आरंभ ही एक प्रश्न से होता है — गाँव-गाँव डाकघर खुल जाने और घर बैठे लंका तक ख़बर भेज सकने के ज़माने में भी कोई मुँह-ज़ुबानी संवाद क्यों भेजेगा?
आगे का पूरा वर्णन इसी मौखिक संदेशवाहक के इर्द-गिर्द चलता है — बुलाहट पर उसका अचरज, वातावरण सूँघकर संवाद का अंदाज़ लगाने की उसकी आदत, तथा गुप्त समाचार ले जाने की आशंका।
बड़ी हवेली तथा बड़ी बहुरिया का वर्णन इस बुलाहट की पृष्ठभूमि देता है — वह बताता है कि संवाद कहाँ से और किन बदली हुई परिस्थितियों में भेजा जा रहा है।
अतः आरंभ से अंत तक केंद्र में वही मौखिक संदेशवाहक है, जिसे हिंदी में ‘संवदिया’ कहा जाता है; दोनों कसौटियाँ इसी शब्द पर पूरी उतरती हैं।
जाँच: चारों शब्दों को एक ही कसौटी पर रखकर देखिए —
शब्द | कसौटी पर परिणाम |
|---|---|
संवदिया | गद्यांश का सूत्र-प्रश्न तथा आरंभ से अंत तक का वर्णन इसी के इर्द-गिर्द — व्यापकता और केंद्रीयता, दोनों पूरी। |
बड़ी बहू | गद्यांश का एक पात्र; उसकी बदली दशा का वर्णन एक सूत्र है, पूरा गद्यांश नहीं। |
हवेली | एक स्थान तथा पृष्ठभूमि; गद्यांश भवन पर नहीं, उसके भीतर घटित प्रसंग पर ठहरता है। |
डाकिया | डाकघर का उल्लेख केवल तुलना के लिए आया है; गद्यांश में कोई डाकिया न बोलता है, न कुछ करता है। |
निष्कर्ष: गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक ‘संवदिया’ है।
टिप्पणी: यह अंश फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘संवदिया’ से लिया गया है, जिसका शीर्षक स्वयं यही है।