‘अपेक्षा’ का विशेषण रूप क्या है?
2017
‘अपेक्षा’ का विशेषण रूप क्या है?
Answer: D. अपेक्षित — अवधारणा: हिंदी में मूल धातु 'अपेक्ष्' (देखना/चाहना का भाव) में विभिन्न उपसर्ग (स-, निर्-) व प्रत्यय (-इत) जोड़कर कई भिन्न-भिन्न किंतु संबंधित अर्थ वाले शब्द…
- A.
सापेक्ष
- B.
उपेक्षा
- C.
निरपेक्ष
- D.
अपेक्षित
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Correct answer: D
अवधारणा: हिंदी में मूल धातु 'अपेक्ष्' (देखना/चाहना का भाव) में विभिन्न उपसर्ग (स-, निर्-) व प्रत्यय (-इत) जोड़कर कई भिन्न-भिन्न किंतु संबंधित अर्थ वाले शब्द बनते हैं; प्रत्यय 'इत' मूल भाव को 'हुआ/की गई' के अर्थ में विशेषण में बदल देता है (उदाहरण—आदेश से आदेशित, मूल्यांकन से मूल्यांकित), जबकि उपसर्ग शब्द के भाव को दूसरी दिशा में मोड़ देते हैं (जैसे स-/निर्- से सापेक्ष/निरपेक्ष, जो 'निर्भरता/स्वतंत्रता' का भाव देते हैं)।
प्रयोग: 'अपेक्षा' (संज्ञा, अर्थ—प्रत्याशा/आवश्यकता) के मूल धातु 'अपेक्ष्' में कृदंत प्रत्यय 'इत' जोड़ने पर 'अपेक्षित' शब्द बनता है, जिसका अर्थ है 'जिसकी अपेक्षा की गई हो' अर्थात 'आवश्यक/प्रत्याशित'। यही 'अपेक्षा' का सही विशेषण रूप है।
तुलना (शेष विकल्प क्यों अनुपयुक्त हैं):
सापेक्ष — यह भी उसी धातु 'अपेक्ष्' से बना विशेषण है (उपसर्ग 'स-' सहित), किंतु इसका भाव 'तुलनात्मक/निर्भर (relative/dependent)' है (संबंधित अवधारणा—सापेक्षता), 'अपेक्षित' जैसा 'प्रत्याशा' का भाव नहीं।
उपेक्षा — यह स्वयं एक भिन्न संज्ञा है, जिसका अर्थ है 'अनदेखी/तिरस्कार (neglect/disregard)'; यह विशेषण नहीं है।
निरपेक्ष — यह भी उसी धातु से बना विशेषण है (उपसर्ग 'निर्-' सहित), किंतु इसका भाव 'स्वतंत्र/निरपेक्ष (independent/absolute)' है, जो 'सापेक्ष' का विलोम है, 'प्रत्याशा' का भाव नहीं।
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