न्याय दर्शन में उस अलौकिक प्रत्यक्ष को क्या कहा जाता है, जिसमें किसी वस्तु का…
2024
न्याय दर्शन में उस अलौकिक प्रत्यक्ष को क्या कहा जाता है, जिसमें किसी वस्तु का ग्रहण पूर्वज्ञान के माध्यम से होता है, अर्थात् इन्द्रिय उस पूर्वज्ञान से विशिष्ट वस्तु का ज्ञान करती है?
Answer: B. ज्ञानलक्षण प्रत्यक्ष — संकल्पनान्याय दर्शन सामान्य इन्द्रिय-विषय-सन्निकर्ष से उत्पन्न लौकिक प्रत्यक्ष और विशेष प्रकार के सम्बन्ध के माध्यम से होने वाले अलौकिक प्रत्यक्ष में भेद करता…
- A.
योगज प्रत्यक्ष
- B.
ज्ञानलक्षण प्रत्यक्ष
- C.
सामान्यलक्षण प्रत्यक्ष
- D.
प्रत्यभिज्ञा
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Correct answer: B
संकल्पना
न्याय दर्शन सामान्य इन्द्रिय-विषय-सन्निकर्ष से उत्पन्न लौकिक प्रत्यक्ष और विशेष प्रकार के सम्बन्ध के माध्यम से होने वाले अलौकिक प्रत्यक्ष में भेद करता है।
इसके तीन मानक प्रकार हैं—सामान्यलक्षण (सामान्य के माध्यम से), ज्ञानलक्षण (पूर्वज्ञान के माध्यम से) और योगज (योगसामर्थ्य के माध्यम से)।
अनुप्रयोग
प्रश्न में पूर्वज्ञान को स्पष्टतः माध्यमकारी कारक बताया गया है: इन्द्रिय वस्तु का ग्रहण केवल सामान्य भौतिक सन्निकर्ष से नहीं करती, बल्कि पूर्वज्ञान वर्तमान ग्रहण को विशिष्ट करता है। यह परिभाषक प्रक्रिया ज्ञानलक्षण प्रत्यक्ष है।
भेद
योगज प्रत्यक्ष पूर्ववर्ती सामान्य ज्ञान से नहीं, बल्कि सिद्ध योगी में माने गए असाधारण ज्ञान-सामर्थ्य से उत्पन्न होता है।
सामान्यलक्षण प्रत्यक्ष किसी विशेष उदाहरण के माध्यम से सामान्य अथवा जातिगत धर्म के ग्रहण से सम्बन्धित है।
प्रत्यभिज्ञा वर्तमान में प्रत्यक्ष वस्तु को पूर्वज्ञात उसी वस्तु के रूप में पहचानना है; यह यहाँ वर्णित तीन अलौकिक इन्द्रिय-विषय-सम्बन्धों में से एक नहीं है।
पुनःपरीक्षण एवं निष्कर्ष
माध्यमकारी कारक से मिलान करने पर वर्गीकरण सीधे प्राप्त होता है: पूर्वज्ञान ज्ञानलक्षण के अनुरूप है। अतः अपेक्षित पद ज्ञानलक्षण प्रत्यक्ष है।