श्रीधन्य कटक विश्वविद्यालय ने किसकी जीवन-अवधि के दौरान प्रतिष्ठित स्थान…

2024

श्रीधन्य कटक विश्वविद्यालय ने किसकी जीवन-अवधि के दौरान प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया?

Answer: A. सन्त नागार्जुनसंकल्पना — प्राचीन भारत के किसी महान शिक्षण-केन्द्र की पहचान उसे पोषित करने वाली धार्मिक-दार्शनिक परम्परा से की जाती है और उसका काल-निर्धारण उस आचार्य के युग…

  1. A.

    सन्त नागार्जुन

  2. B.

    सन्त शंकराचार्य

  3. C.

    सन्त रामानुज

  4. D.

    सन्त प्रभाकर

Show answer & explanation

Correct answer: A

संकल्पना — प्राचीन भारत के किसी महान शिक्षण-केन्द्र की पहचान उसे पोषित करने वाली धार्मिक-दार्शनिक परम्परा से की जाती है और उसका काल-निर्धारण उस आचार्य के युग के आधार पर किया जाता है, जिसके सम्प्रदाय का वह केन्द्र था। अतः "यह केन्द्र किसके जीवनकाल में प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुँचा?" जैसे प्रश्न का समाधान केन्द्र की प्रमुख परम्परा और उसके अवशेषों के पुरातात्त्विक काल का उस परम्परा के प्रधान प्रतिपादक के जीवनकाल से मिलान करके किया जाता है।

अनुप्रयोग — श्रीधान्यकटक, अर्थात् धान्यकटक या श्री धान्यकटक, वर्तमान आंध्र प्रदेश में निचली कृष्णा नदी के तट पर आधुनिक अमरावती स्थित प्राचीन नगर है, जो अपने विशाल स्तूप के लिए प्रसिद्ध है। प्राचीन भारत में शिक्षा के मानक इतिहास-ग्रंथ इसे ब्राह्मणीय तथा बौद्ध—दोनों परंपराओं के एक विख्यात शिक्षा-केंद्र के रूप में दर्ज करते हैं, जिसने सातवाहन संरक्षण में ईसवी सन् की आरंभिक शताब्दियों में प्रतिष्ठा प्राप्त की। यही वह काल है जो महायान बौद्ध धर्म के माध्यमिक संप्रदाय के संस्थापक आचार्य नागार्जुन को निर्दिष्ट किया जाता है; उनकी परंपरा आंध्र प्रदेश के निचली कृष्णा क्षेत्र की इस बौद्ध पट्टी में फली-फूली। तिब्बती और चीनी वृत्तांत उनके जीवन के उत्तरकाल को उसी क्षेत्र के एक अलग पहाड़ी स्थल श्रीपर्वत से जोड़ते हैं, जो आज नागार्जुनकोंडा के रूप में उनका नाम धारण करता है। अतः इस केंद्र ने संत नागार्जुन के जीवनकाल में ही अपना प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया।

प्रति-जाँच — उल्लिखित चार आचार्यों के कालों और परम्पराओं की तुलना कीजिए:

आचार्य

काल

परम्परा

नागार्जुन

लगभग दूसरी शताब्दी ईस्वी

माध्यमिक बौद्ध धर्म

प्रभाकर

लगभग सातवीं–आठवीं शताब्दी ईस्वी

पूर्व मीमांसा

शंकराचार्य

लगभग आठवीं शताब्दी ईस्वी

अद्वैत वेदान्त

रामानुज

लगभग ग्यारहवीं–बारहवीं शताब्दी ईस्वी

विशिष्टाद्वैत वेदान्त

अन्य तीन आचार्य बहुत बाद के काल के ब्राह्मणीय संप्रदायों से संबंधित हैं और धान्यकटक के सातवाहन-कालीन उत्कर्ष के कई शताब्दियों बाद हुए; अतः ईस्वी सन् की आरंभिक शताब्दियों में इस स्थल की प्रतिष्ठा का काल-निर्धारण उत्तर के रूप में नागार्जुन को निश्चित करता है।

Explore the full course: Nta Ugc Net Paper 1

Loading lesson…