राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
2025
राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
Answer: B. न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है — संकल्पना: संविधान का अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति देता है — क्षमा, प्रविलंबन, विराम या दंड-माफी देने तथा दंडादेश को निलंबित, परिहरित या लघुकृत…
- A.
केवल सिविल न्यायालयों पर लागू होता है
- B.
न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है
- C.
सैन्य कानून के मामलों में लागू नहीं होता है
- D.
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को रद्द कर सकता है
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Correct answer: B
संकल्पना: संविधान का अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति देता है — क्षमा, प्रविलंबन, विराम या दंड-माफी देने तथा दंडादेश को निलंबित, परिहरित या लघुकृत करने की शक्ति। यह मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जाने वाला कार्यपालिका का दया-कार्य है, जो दोषसिद्धि से उपजे दंड और उसके परिणामों पर काम करता है, न कि न्यायालय के निर्णय पर।
अनुच्छेद 72(1) इसके प्रयोग के तीन वर्ग गिनाता है:
कोर्ट-मार्शल द्वारा दी गई सज़ा या दंडादेश;
संघ की कार्यपालिका शक्ति के विषय से संबंधित किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दंड;
प्रत्येक ऐसा मामला जिसमें दंडादेश मृत्युदंड है।
अनुप्रयोग: चूँकि क्षमादान एक कार्यपालिका कार्य है, इसकी परीक्षा उसी प्रकार की जा सकती है जैसे अन्य कार्यपालिका कार्यों की। सर्वोच्च न्यायालय ने तय किया है कि यह शक्ति निरपेक्ष नहीं है: अनुच्छेद 72 के अधीन आदेश को सीमित आधारों पर परखा जा सकता है — विवेक का प्रयोग न होना, दुर्भावना, असंगत या बाह्य विचारों पर निर्भरता, मनमानी, अथवा सुसंगत सामग्री के बिना लिया गया निर्णय। मारू राम बनाम भारत संघ (1981) ने यह स्थिति पहली बार संकेतित की, केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989) ने सीमित न्यायिक विचारणीयता की पुष्टि की, और एपुरु सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश सरकार (2006) ने स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया कि ऐसे आदेश इन आधारों पर न्यायिक समीक्षा के लिए खुले हैं। अतः यही कथन सही है कि क्षमादान शक्ति न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
प्रति-परीक्षण: शेष कथनों को इन्हीं उपबंधों पर कसने पर:
“केवल सिविल न्यायालयों पर लागू होता है” टिकता नहीं, क्योंकि अनुच्छेद 72 दांडिक मामलों की दया-अधिकारिता है; इसके तीन वर्ग कोर्ट-मार्शल की सज़ा, संघ-विधि के अपराध और मृत्युदंड हैं, और दीवानी डिक्री का निष्पादन सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन होता है।
“सैन्य कानून के मामलों में लागू नहीं होता है” टिकता नहीं, क्योंकि अनुच्छेद 72(1)(क) कोर्ट-मार्शल द्वारा दी गई सज़ा या दंडादेश का स्पष्ट उल्लेख करता है; इसके अतिरिक्त सेना अधिनियम, 1950 की धारा 179 सेनाध्यक्ष को पृथक क्षमा एवं दंड-माफी की शक्ति देती है।
“सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को रद्द कर सकता है” टिकता नहीं, क्योंकि केहर सिंह के अनुसार क्षमादान न्यायिक अभिलेख को न तो संशोधित करता है, न अधिक्रांत करता है, न विचलित; निर्णय यथावत रहता है और सर्वोच्च न्यायालय के अपने निर्णय को केवल अनुच्छेद 137 के पुनर्विलोकन तथा सीमित क्यूरेटिव याचिका के माध्यम से ही पुनः खोला जा सकता है।
अतः अनुच्छेद 72 के अधीन क्षमादान शक्ति सीमित आधारों पर न्यायिक समीक्षा के अधीन है।