सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत के संदर्भ में, अधिगम और अभिप्रेरण में…
2025
सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत के संदर्भ में, अधिगम और अभिप्रेरण में आत्म-प्रभाविता (self-efficacy) क्या भूमिका निभाती है?
Answer: A. उच्च आत्म-प्रभाविता चुनौतियों का सामना करने में अपेक्षाकृत अधिक प्रेरणा, दृढ़ता और लचीलापन प्रदान करती है। — संकल्पना: आत्म-प्रभाविता (self-efficacy) का अर्थ है — किसी निर्दिष्ट निष्पादन तक पहुँचने के लिए आवश्यक क्रियाओं को संगठित और सम्पन्न करने की अपनी सामर्थ्य के…
- A.
उच्च आत्म-प्रभाविता चुनौतियों का सामना करने में अपेक्षाकृत अधिक प्रेरणा, दृढ़ता और लचीलापन प्रदान करती है।
- B.
आत्म-प्रभाविता, अधिगम के लिए अप्रासंगिक है; केवल बाह्य पारितोषिक और दंड ही महत्वपूर्ण अभिप्रेरक होते हैं।
- C.
निम्न आत्म-प्रभाविता, व्यक्तियों को सहायता और मार्गदर्शन लेने के लिए अभिप्रेरित करके उनके प्रदर्शन में वृद्धि करती है।
- D.
आत्म-प्रभाविता एक स्थिर लक्षण है जो समय के साथ नहीं बदलता है और अधिगम के परिणामों को प्रभावित नहीं करता है।
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Correct answer: A
संकल्पना: आत्म-प्रभाविता (self-efficacy) का अर्थ है — किसी निर्दिष्ट निष्पादन तक पहुँचने के लिए आवश्यक क्रियाओं को संगठित और सम्पन्न करने की अपनी सामर्थ्य के विषय में व्यक्ति का अपना निर्णय (अल्बर्ट बंडूरा, सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत)। यह कोई सामान्य व्यक्तित्व-लक्षण नहीं, बल्कि क्षेत्र-विशिष्ट और परिवर्तनशील मान्यता है। इसके चार स्रोत बताए गए हैं:
प्रभुत्व-अनुभव (mastery experiences) — स्वयं की सफलता या असफलता का प्रत्यक्ष अनुभव, जो सबसे प्रबल स्रोत है।
वैकल्पिक अनुभव (vicarious experience) — अपने समान किसी अन्य व्यक्ति को कार्य करते हुए देखना।
शाब्दिक अनुनय (verbal persuasion) — दूसरों द्वारा दिया गया विश्वसनीय प्रोत्साहन या प्रतिपुष्टि।
शारीरिक एवं भावात्मक अवस्थाएँ — तनाव, थकान या उत्तेजना की अनुभूति और उसकी व्याख्या।
अनुप्रयोग: सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत में ये प्रभाविता-मान्यताएँ निम्नलिखित निश्चित माध्यमों से व्यवहार को नियंत्रित करती हैं:
कार्य का चयन — कितना कठिन लक्ष्य स्वीकार किया जाएगा।
लगाया गया प्रयास — कार्य में कितनी ऊर्जा दी जाएगी।
दृढ़ता — बाधा या असफलता के बाद कितनी देर तक प्रयास जारी रहेगा।
लचीलापन तथा चिंतन-भावना का प्रतिरूप — असफलता के बाद कितनी शीघ्रता से पुनःसंभलना होगा, और चिंता या आत्म-संदेह कितना उठेगा।
अतः जिस अधिगमकर्ता की किसी क्षेत्र में प्रभाविता-मान्यता प्रबल है, वह कठिनतर कार्य चुनता है, अधिक प्रयास लगाता है, अवरोध आने पर अधिक देर तक टिका रहता है और असफलता के बाद शीघ्र संभल जाता है; दुर्बल मान्यता कार्य-परिहार, कम प्रयास और शीघ्र हार मानने की ओर ले जाती है। इसी कारण स्वीकृत उत्तर यह है कि उच्च आत्म-प्रभाविता अपेक्षाकृत अधिक अभिप्रेरणा, दृढ़ता और लचीलापन उत्पन्न करती है।
प्रति-परीक्षण: शेष तीनों कथनों को उसी ढाँचे पर जाँचिए —
“आत्म-प्रभाविता अप्रासंगिक है; केवल बाह्य पारितोषिक और दंड ही अभिप्रेरक हैं” — यह क्रिया-प्रसूत व्यवहारवाद (स्किनर) की स्थिति है। सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत इसमें पारस्परिक निर्धारणवाद (व्यक्ति ↔ व्यवहार ↔ परिवेश) जोड़ता है और आंतरिक मान्यताओं को भी कारण मानता है, इसलिए अकेले पुनर्बलन से व्याख्या पूरी नहीं होती।
“निम्न आत्म-प्रभाविता सहायता माँगने के लिए प्रेरित करके प्रदर्शन बढ़ाती है” — अनुकूली (साधनात्मक) सहायता-याचना प्रबल प्रभाविता वाले अधिगमकर्ताओं में अधिक पाई जाती है; दुर्बल प्रभाविता प्रायः सहायता माँगने से बचने और कार्य से दूर हटने के साथ आती है, अतः यह व्युत्क्रम संबंध टिकता नहीं।
“आत्म-प्रभाविता एक स्थिर लक्षण है जो अधिगम-परिणामों को प्रभावित नहीं करती” — प्रभुत्व-अनुभव इसका सबसे प्रबल स्रोत है, अर्थात प्रत्येक सफलता या असफलता इसे बदलती है; और यह प्रयास तथा दृढ़ता के माध्यम से उपलब्धि को प्रभावित करती है।
परिणाम: उच्च आत्म-प्रभाविता → चुनौतियों के सामने अधिक अभिप्रेरणा, अधिक दृढ़ता और अधिक लचीलापन।