Comprehension: गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दें। उत्तर भारत की सभी…
2025
Comprehension:
गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दें।
उत्तर भारत की सभी भाषाएँ प्रायः संस्कृत से निकली हैं, और उन सबके शब्दों में पारिवारिक समानता है। दक्षिण की भाषाएँ भी संस्कृत से प्रभावित हुई हैं। उन्होंने भी थोड़ी-बहुत मात्रा में संस्कृत की शब्दावली ग्रहण की, किसी ने थोड़ी तो किसी ने बहुत। उर्दू को छोड़कर प्रायः सभी भाषाओं की वर्णमाला एक नहीं तो एक सी है। केवल लिपि का भेद है। मराठी और देव-भाषा संस्कृत की लिपि समान है। संस्कृत की परिनिष्ठित लिपि होने के कारण देवनागरी प्रायः सभी प्रांतों में पहचानी जाती है। उर्दू का लिपि भेद होते हुए भी हिंदी के साथ भाषा-साम्य है। भाषा की जमीन और व्याकरण प्रायः एक से हैं, सिर्फ बेल-बूटे फारसी-अरबी के हैं। यही कारण है कि उर्दू को हिंदी से विलग नितांत स्वतंत्र और भिन्न भाषा के रूप में भाषा-वैज्ञानिक स्वीकार नहीं करते, अपितु उसे हिंदी भाषा की ही एक अन्य शैली मानते हैं।
'अपितु उसे हिंदी भाषा की ही एक अन्य शैली मानते हैं ।' वाक्य का आशय है-
Answer: B. हिंदी भाषा के विभिन्न स्थानीय रूपों की भांति उर्दू भी इसका एक खड़ीबोली पर आधारित भाषिक-रूप ही है । — 'आशय' (अभिप्राय) पूछने वाले प्रश्नों में उस विकल्प को चुनना होता है जो गद्यांश में दिए गए वाक्य के मूल भाव को बिना कोई नई या भिन्न बात जोड़े, सही रूप में…
- A.
गद्य और पद्य की भांति उर्दू भी एक लेखन शैली है ।
- B.
हिंदी भाषा के विभिन्न स्थानीय रूपों की भांति उर्दू भी इसका एक खड़ीबोली पर आधारित भाषिक-रूप ही है ।
- C.
उर्दू भाषा हिंदी को फारसी में लिखने की एक कला मात्र है, इसीलिए ऐसा कहा गया है ।
- D.
हिंदी को अलग-अलग लिपियों में लिखने की परंपरा रही है और उर्दू इसी का एक उदाहरण है ।
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Correct answer: B
'आशय' (अभिप्राय) पूछने वाले प्रश्नों में उस विकल्प को चुनना होता है जो गद्यांश में दिए गए वाक्य के मूल भाव को बिना कोई नई या भिन्न बात जोड़े, सही रूप में दर्शाए। यहाँ प्रयुक्त शब्द 'शैली' का आशय एक भाषिक-रूप (भाषा का प्रकार) है, न कि गद्य-पद्य जैसी कोई साहित्यिक रचना-विधा।
गद्यांश के अनुसार उर्दू को छोड़कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं की वर्णमाला एक-सी है; केवल लिपि में अंतर है।
गद्यांश स्पष्ट करता है कि उर्दू की लिपि भिन्न होने पर भी उसकी हिंदी के साथ 'भाषा-साम्य' है, अर्थात दोनों की भाषिक बुनियाद (जमीन) और व्याकरण एक समान हैं।
इस प्रकार अंतर मुख्यतः लिपि और शब्दावली के स्तर पर है — उर्दू में फारसी-अरबी के शब्द (बेल-बूटे के रूप में) जुड़े हैं — जबकि भाषिक बुनियाद (जमीन) और व्याकरण का ढांचा वही रहता है।
इसी आधार पर भाषा-वैज्ञानिक उर्दू को हिंदी से पूर्णतः स्वतंत्र भाषा नहीं मानते, बल्कि उसे हिंदी भाषा के ही एक अन्य भाषिक-रूप ('शैली') के रूप में देखते हैं — ठीक वैसे ही जैसे हिंदी के विभिन्न क्षेत्रीय रूप खड़ीबोली पर आधारित हिंदी के ही प्रकार माने जाते हैं।
गद्यांश के इस कथन से प्रत्येक विकल्प की तुलना:
'गद्य और पद्य की भांति उर्दू एक लेखन शैली है' — यह कथन 'शैली' को साहित्यिक रचना-विधा (जैसे गद्य/पद्य) के अर्थ में लेता है, जबकि गद्यांश में यह भाषिक-रूप (भाषा-भेद) की बात कर रहा है।
'उर्दू, हिंदी को फारसी लिपि में लिखने की कला मात्र है' — यह कथन मामले को केवल लिपि-रूपांतरण तक सीमित करता है, जबकि गद्यांश लिपि-भेद के बावजूद व्याकरण व भाषिक-आधार की समानता (भाषा-साम्य) की बात करता है।
'हिंदी को अलग-अलग लिपियों में लिखने की परंपरा है, उर्दू उसका उदाहरण है' — यह भी लिपि-भेद पर केंद्रित है और गद्यांश में बताई गई शब्दावली/भाषिक-रूप वाली गहरी बात को स्पष्ट नहीं करता।
अतः गद्यांश के आशय के अनुरूप सही व्याख्या यही है कि हिंदी भाषा के विभिन्न स्थानीय रूपों की भांति उर्दू भी उसका एक खड़ीबोली-आधारित भाषिक-रूप ही है।