भारत में नाटक साहित्य की एक ऐसी विधा है, जिसकी लंबी परंपरा पाई जाती है। भारत…

2026

भारत में नाटक साहित्य की एक ऐसी विधा है, जिसकी लंबी परंपरा पाई जाती है। भारत में ही नाट्यशास्त्र की रचना सबसे पहले हुई। यहाँ नाट्यशास्त्र के अनेक आचार्य हुए, जिन्होंने नाटक पर बड़े विस्तार और गंभीरता से इस विधा पर विचार किया है। इनमें भरत, धनंजय, रामचंद्र-गुणचंद्र, अभिनवगुप्त, विश्वनाथ आदि के नाम अधिक प्रसिद्ध हैं। आचार्य धनंजय ने नाटक की परिभाषा इस प्रकार बताई है- अवस्था की अनुकृति नाटक है। यह परिभाषा सार्थक, व्यावहारिक और उपयोगी है। नाटक में अनुकरण तत्त्व की प्रधानता है। साहित्य की सभी विधाओं में नाटक ही वह विधा है, जिसमें अनुकरण पर सर्वाधिक बल दिया गया है। यह अनुकरण किसका होता है? उत्तर है- कार्य, अर्थात् मानवीय जीवन के क्रियाशील कार्यों का। मनुष्य अनेक परिस्थितियों से हर क्षण गुजरता है। उसकी विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में रहने के कारण उसके जीवन-रंगमंच पर अनेक दृश्य (स्थितियाँ) आते-जाते रहते हैं। नाटककार नाटक की रचना करते समय इन्हीं स्थितियों का अनुकरण करता है। नाटक में जीवन का यथार्थमूलक अनुकरण होते हुए भी नाटककार सर्जनात्मक कल्पना करता है। यही कल्पना नाटक को साहित्य की विधा प्रदान करती है। इसलिए नाटक एक ऐसी कला है, जिसमें अनुकरण और कल्पना दोनों का योग रहता है। इसका उद्देश्य पहले शिक्षण और मनोरंजन था।

Q. आचार्य धनंजय के अनुसार नाटक की परिभाषा क्या है?

Answer: A. अवस्था की अनुकृतिआचार्य धनंजय ने नाटक की परिभाषा “अवस्था की अनुकृति नाटक है” बताई है। गद्यांश में यह बात सीधे दी गई है, इसलिए सही उत्तर “अवस्था की अनुकृति” है।

  1. A.

    अवस्था की अनुकृति

  2. B.

    कल्पना और यथार्थ का समन्वय

  3. C.

    रस की अनुभूति कराने वाली विधा

  4. D.

    जीवन की कलात्मक अभिव्यक्ति

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Correct answer: A

आचार्य धनंजय ने नाटक की परिभाषा “अवस्था की अनुकृति नाटक है” बताई है। गद्यांश में यह बात सीधे दी गई है, इसलिए सही उत्तर “अवस्था की अनुकृति” है।

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