"काहे री नलिनी तू कुम्हलानी तेरे ही नालि सरोवर पानी" पंक्ति के रचनाकार कौन हैं ?
2016
"काहे री नलिनी तू कुम्हलानी तेरे ही नालि सरोवर पानी" पंक्ति के रचनाकार कौन हैं ?
Answer: C. कबीर — अवधारणा: भक्तिकाल की निर्गुण संत-परंपरा के कवि — विशेषतः कबीर — अपने पदों में प्रकृति के परिचित बिंबों (नलिनी/कमल, हिरण, जल आदि) का प्रयोग आध्यात्मिक सत्य…
- A.
जायसी
- B.
रैदास
- C.
कबीर
- D.
दादू
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Correct answer: C
अवधारणा: भक्तिकाल की निर्गुण संत-परंपरा के कवि — विशेषतः कबीर — अपने पदों में प्रकृति के परिचित बिंबों (नलिनी/कमल, हिरण, जल आदि) का प्रयोग आध्यात्मिक सत्य समझाने के लिए करते हैं, विशेष रूप से इस विचार को कि सत्य/परमात्मा साधक के भीतर ही विद्यमान है, बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही, संत कवि प्रायः अपने पद के अंत में स्वयं का नाम (छाप/भणिता के रूप में) जोड़कर रचनाकार की पहचान स्वयं प्रमाणित करते हैं।
प्रयोग: प्रस्तुत पंक्ति में कवि नलिनी (कमल) को संबोधित करते हुए पूछता है कि जब उसकी अपनी नाल में ही सरोवर का पानी विद्यमान है, तब वह क्यों कुम्हला रही है — यह कबीर की उस विशिष्ट शैली से मेल खाता है जिसमें सत्य को बाहर खोजने के बजाय भीतर देखने पर बल दिया जाता है (जैसे उनकी प्रसिद्ध पंक्ति "कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे बन माहि")। यह पद कबीर ग्रंथावली में राग गौड़ी के अंतर्गत (पद 64) संकलित है, तथा पद के अंत की छाप-पंक्ति "कहै कबीर..." भी रचनाकार की पहचान की पुष्टि करती है।
जाँच/तुलना — अन्य विकल्पों से भिन्नता:
जायसी: सूफ़ी परंपरा के अवधी प्रेमाख्यान महाकाव्यों (जैसे 'पद्मावत') के रचयिता; सधुक्कड़ी हिंदी में रचित यह निर्गुण पद उनकी शैली से मेल नहीं खाता।
रैदास: जाति-समानता व भक्ति-भाव पर आधारित पदों (जैसे "मन चंगा तो कठौती में गंगा") के लिए विख्यात; यह पद उनके संकलन का भाग नहीं है।
दादू: दादूपंथ के संस्थापक तथा दादू-वाणी के रचयिता; यह पद उनकी काव्य-परंपरा से भिन्न परंपरा में संकलित है।
अतः इस पंक्ति के रचनाकार कबीर हैं।