दिए गए गद्यांश को पढ़ें और दिए गए प्रश्न के उत्तर दें। द्विवेदी-युगीन गद्य का…
2022
दिए गए गद्यांश को पढ़ें और दिए गए प्रश्न के उत्तर दें।
द्विवेदी-युगीन गद्य का पोषण अधिकतर पत्रकारिता और निबंध-कला से हुआ है। इस युग में आकर निबंध केवल साहित्यिक शैली का निदर्शन न होकर गंभीर चिंतन का स्वतंत्र कला-माध्यम बना। उत्तरोत्तर प्रखर होती राजनैतिक चेतना जहाँ तक सीधे रूप में नियम-कानून के भीतर व्यक्त की जा सकती थी, वहाँ तक तो पत्रकारिता में उसका समावेश होता था। उससे आगे गहरे व्यंग्य और निर्भीक कटाक्ष के रूप में वह निबंध-कला में अभिव्यक्ति पाती थी। बालमुकुंद गुप्त, माधवप्रसाद मिश्र, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, गुलाबराय, श्यामसुंदरदास इस युग के प्रमुख निबंधकार हैं। श्यामसुंदरदास की ख्याति खड़ीबोली हिंदी के आदि व्यवस्थापक के रूप में है। महावीरप्रसाद द्विवेदी यदि 'सरस्वती' पत्रिका और नये लेखन के संरक्षण-संशोधन के लिए जाने जाते हैं तो श्यामसुंदरदास विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षण व्यवस्था और काशी की संस्था नागरी प्रचारिणी सभा के लिए। 'सरस्वती' का प्रकाशन 1900 से इलाहाबाद से आरम्भ हुआ, पर उसकी संपादकीय नीति का अनुमोदन नागरी प्रचारिणी सभा करती थी। नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना 1893 में काशी में हुई - संस्थापक थे- श्यामसुंदरदास, रामनारायण मिश्र और ठाकुर शिवकुमार सिंह। सभा के विविध कार्य-कलापों में से तीन आयोजन विशिष्ट महत्त्व और दूरगामी प्रभाव के सिद्ध हुए — हिंदी शब्द सागर, जिसकी प्रस्तावना के रूप में हिंदी साहित्य का इतिहास संक्षेप में लिखा गया; तथा हिंदी भाषा का व्याकरण। इन योजनाओं के पीछे श्यामसुंदरदास का हाथ कहा जा सकता है। कोश, इतिहास और व्याकरण लेखन ने हिंदी को उसके स्वरूप का अभिज्ञान दिया, जिस प्रक्रिया में तीन अपने ढंग के विशिष्ट व्यक्तित्वों का उदय हुआ- कोशकार रामचंद्र वर्मा, इतिहासकार रामचंद्र शुक्ल और वैयाकरण कामताप्रसाद गुरु। इनके वैदुषिक कार्यकलाप के पीछे श्यामसुंदर दास की प्रेरणा वैसे ही थी जैसे मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद और निराला की रचनात्मकता के पीछे महावीरप्रसाद द्विवेदी की।
निम्नलिखित में से कौन द्विवेदी-युगीन निबंधकार नहीं है?
Answer: A. प्रतापनारायण मिश्र — अवधारणा: द्विवेदी युग (लगभग सन् 1900-1920) हिंदी गद्य-साहित्य का वह कालखंड है जिसमें निबंध केवल पत्रकारिता-शैली तक सीमित न रहकर गंभीर चिंतन का स्वतंत्र…
- A.
प्रतापनारायण मिश्र
- B.
बालमुकुंद गुप्त
- C.
माधवप्रसाद मिश्र
- D.
गुलाबराय
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Correct answer: A
अवधारणा: द्विवेदी युग (लगभग सन् 1900-1920) हिंदी गद्य-साहित्य का वह कालखंड है जिसमें निबंध केवल पत्रकारिता-शैली तक सीमित न रहकर गंभीर चिंतन का स्वतंत्र कला-माध्यम बना; किसी गद्यांश में इस युग के प्रमुख निबंधकारों की पहचान वहाँ किए गए स्पष्ट नामोल्लेख से होती है।
प्रयोग: दिए गए गद्यांश की दूसरी पंक्ति में बालमुकुंद गुप्त, माधवप्रसाद मिश्र, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, गुलाबराय और श्यामसुंदरदास को द्विवेदी युग के प्रमुख निबंधकार बताया गया है। प्रतापनारायण मिश्र का नाम गद्यांश में कहीं भी नहीं आता।
तुलना: चारों विकल्पों की कालखंड-संबद्धता इस प्रकार है —
प्रतापनारायण मिश्र — भारतेंदु युग (लगभग सन् 1868-1894) के निबंधकार-व्यंग्यकार माने जाते हैं; उनका निधन द्विवेदी युग के आरम्भ से पहले ही हो चुका था, अतः वे द्विवेदी युग में सक्रिय नहीं थे।
बालमुकुंद गुप्त — गद्यांश में द्विवेदी युग के निबंधकार के रूप में सूचीबद्ध हैं।
माधवप्रसाद मिश्र — गद्यांश में द्विवेदी युग के निबंधकार के रूप में सूचीबद्ध हैं।
गुलाबराय — गद्यांश में द्विवेदी युग के निबंधकार के रूप में सूचीबद्ध हैं।
अतः गद्यांश की सूची और साहित्यिक इतिहास दोनों की पुष्टि से स्पष्ट है कि प्रतापनारायण मिश्र द्विवेदी युगीन निबंधकार नहीं हैं; सही उत्तर 'प्रतापनारायण मिश्र' है।