आप छठी कक्षा के बच्चों के लिए हिंदी भाषा सीखने-सिखाने की किस पद्धति का समर्थन…
2021
आप छठी कक्षा के बच्चों के लिए हिंदी भाषा सीखने-सिखाने की किस पद्धति का समर्थन करेंगे?
Answer: C. जिसमें बच्चे परस्पर अंतः क्रिया करते हैं। — अवधारणा: भाषा-अर्जन एक सामाजिक-रचनावादी प्रक्रिया है — वाइगोत्स्की के सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत और संप्रेषणात्मक भाषा-शिक्षण दृष्टिकोण के अनुसार बच्चे भाषा…
- A.
जिसमें बच्चों को बोलने के अवसर मिलें।
- B.
जिसमें बच्चों को पाठ्य-पुस्तक बिल्कुल न पढ़नी हो।
- C.
जिसमें बच्चे परस्पर अंतः क्रिया करते हैं।
- D.
जिसमें बच्चे केवल लेखन कार्य करते हैं।
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Correct answer: C
अवधारणा: भाषा-अर्जन एक सामाजिक-रचनावादी प्रक्रिया है — वाइगोत्स्की के सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत और संप्रेषणात्मक भाषा-शिक्षण दृष्टिकोण के अनुसार बच्चे भाषा को सार्थक सामाजिक अंतःक्रिया — सुनने, बोलने, प्रतिक्रिया देने और अर्थ-निर्माण — के माध्यम से प्रभावी ढंग से सीखते हैं, न कि किसी एक कौशल के पृथक और यांत्रिक अभ्यास से। एनसीएफ 2005 भी बाल-केंद्रित, अंतःक्रियात्मक कक्षा का समर्थन करता है।
अनुप्रयोग: छठी कक्षा के लिए भाषा-शिक्षण में सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना — इन दक्षताओं को समय के साथ विकसित करना अपेक्षित है। जिस पद्धति में बच्चे आपस में अंतः क्रिया करते हैं, उसमें बोलने के साथ-साथ सुनने और प्रतिक्रिया देने का द्विपक्षीय भाषा-प्रयोग कक्षा-गतिविधि में स्वाभाविक रूप से निहित होता है।
बोलने के अवसर देने वाला प्रावधान भाषा-प्रयोग के बोलने वाले पक्ष को विकसित करता है; परन्तु यह अपने आप में इस बारे में स्पष्ट नहीं करता कि बच्चों को सुनने-समझने, पढ़ने या लिखने का अभ्यास भी साथ में मिलता है या नहीं।
पाठ्य-पुस्तक को पूर्णतः न पढ़ाने का प्रावधान श्रेणीबद्ध, पूर्व-निर्मित पठन-सामग्री के स्रोत को हटा देता है; यह विकल्प इस बारे में मौन है कि कक्षा 6 के बच्चों के लिए यह संरचित पठन-आगत किस प्रकार प्रतिस्थापित होगा।
केवल लेखन कार्य पर आधारित प्रावधान भाषा के लिखित रूप को विकसित करता है; परन्तु यह इस चरण में सुनने या बोलने के पक्षों के लिए किसी साथ की व्यवस्था का उल्लेख नहीं करता।
अतः, जिस पद्धति में बच्चे परस्पर अंतः क्रिया करते हैं, वह पद्धति सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि इसमें बोलने के साथ-साथ सुनने और प्रतिक्रिया देने की द्विपक्षीय भाषा-प्रयोग की गुंजाइश स्वाभाविक रूप से निहित होती है।