निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे दिए प्रश्नों के उत्तर दीजिए- भारतेन्दु ने…
2025
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे दिए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
भारतेन्दु ने हिन्दी गद्य के जिस रूप का प्रवर्तन किया, आचार्य द्विवेदी ने उस रूप को परिमार्जित करने में अपना योगदान किया। इनका प्रभाव इस काल के अधिकांश कवियों पर पड़ा, जिसके कारण इस काल का नाम ही द्विवेदी-युग पड़ गया। द्विवेदीजी संस्कृत तथा मराठी साहित्य से विशेष प्रभावित थे। इनकी रचनाओं में इनका प्रभाव परिलक्षित होता है। हिन्दी गद्य साहित्य की उन्नति के लिए इन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका का भी सम्पादन किया। 'सरस्वती' के सम्पादन में द्विवेदी जी ने हिन्दी में भाषा तथा व्याकरण से सम्बद्ध त्रुटियां दूर कीं। गद्य-लेखकों के लिए इन्होंने मार्गदर्शक का ही काम नहीं किया, अपितु उनका मार्ग भी प्रशस्त किया। भारतेन्दु हरिश्चंद्र की तरह इन्होंने भी अपना एक मण्डल निर्मित किया, जो द्विवेदी-मण्डल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अपनी आलोचनाओं के माध्यम से द्विवेदीजी ने अधकचरे साहित्यकारों की बुराइयां दूर कीं तथा उन्हें स्वस्थ साहित्य की रचना के लिए प्रेरित भी किया। भाषा को शिष्ट रूप प्रदान करने में द्विवेदीजी सदैव प्रगतिशील रहे। भाषा के पारखी होने के कारण कठिन-से-कठिन विषयों को भी सरल भाषा में व्यक्त करने की इनमें अद्भुत क्षमता थी। संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव शब्दों का समावेश इनके निबंधों में दृष्टिगोचर होता है। विदेशी शब्द अपनाकर हिन्दी बनाने का कार्य भी इन्होंने किया। अंग्रेजी, अरबी, फारसी एवं उर्दू शब्दों का प्रयोग भी यत्र-तत्र उपलब्ध है। द्विवेदीजी की रचनाएँ संख्या में पचास के लगभग हैं। साहित्य, पुरातत्त्व, आलोचना, विज्ञान, नीति आदि विषयों पर इनके अनेक लेख प्रकाशित हैं।
द्विवेदीजी ने 'हिन्दी गद्य का परिमार्जन किया'- से क्या आशय है?
- A.
हिन्दी गद्य को सरल बनाया
- B.
हिन्दी गद्य का परिष्कार किया
- C.
हिन्दी गद्य का प्रसार किया
- D.
हिन्दी गद्य का विकास किया
Attempted by 3 students.
Show answer & explanation
Correct answer: B
'परिमार्जन' का सामान्य अर्थ है किसी वस्तु या रचना में विद्यमान दोषों, त्रुटियों अथवा खामियों को दूर करके उसे अधिक शुद्ध, व्यवस्थित एवं परिष्कृत रूप प्रदान करना। भाषा के संदर्भ में इसका तात्पर्य भाषा-शैली तथा व्याकरण की अशुद्धियों को दूर कर उसे मानक रूप देने से होता है।
गद्यांश में स्पष्ट उल्लेख है कि 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादन में आचार्य द्विवेदी ने हिन्दी में भाषा तथा व्याकरण से सम्बद्ध त्रुटियां दूर कीं। त्रुटियों को दूर कर भाषा को शुद्ध व मानक रूप देने की यही प्रक्रिया परिष्कार कहलाती है; अतः 'हिन्दी गद्य का परिमार्जन किया' का सटीक भावानुवाद 'हिन्दी गद्य का परिष्कार किया' ही है।
शेष तीन भावों की तुलना करने पर परिमार्जन के भाव से उनका अंतर स्पष्ट होता है:
'सरल बनाया' — गद्यांश में यह द्विवेदीजी की एक पृथक विशेषता के रूप में वर्णित है (कठिन-से-कठिन विषयों को सरल भाषा में व्यक्त करने की क्षमता), न कि त्रुटि-निवारण की क्रिया के रूप में; सरलीकरण भाषा को समझने में आसान बनाने से जुड़ा है, दोष दूर करने से नहीं।
'प्रसार किया' — गद्यांश में पत्रिका-सम्पादन व द्विवेदी-मण्डल के निर्माण के माध्यम से प्रयोग-क्षेत्र के विस्तार की बात है; परिमार्जन का सम्बन्ध भाषा की पहुंच बढ़ाने से नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता सुधारने से है।
'विकास किया' — यह समय के साथ हुई सर्वांगीण उन्नति व वृद्धि को इंगित करने वाला व्यापक शब्द है, जबकि परिमार्जन विशेष रूप से विद्यमान त्रुटियों को दूर करने की विशिष्ट सुधार-प्रक्रिया है।
अतः त्रुटि-निवारण द्वारा भाषा को शुद्ध रूप देने के अर्थ में 'परिष्कार किया' ही परिमार्जन का सर्वाधिक उपयुक्त अर्थ है।