आदर्श हिन्दी शिक्षक के लिए आवश्यक है:

2013

आदर्श हिन्दी शिक्षक के लिए आवश्यक है:

Answer: D. उपरोक्त सभी।अवधारणा: किसी भी भाषा-शिक्षक—विशेषतः हिन्दी शिक्षक—की व्यावसायिक योग्यता बहुआयामी होती है। भाषा-शिक्षण सिद्धांत के अनुसार, भाषा-दक्षता तीन परस्पर-पूरक (न कि…

  1. A.

    व्याकरण का ज्ञान होना।

  2. B.

    हिन्दी साहित्य का ज्ञान होना।

  3. C.

    शुद्ध उच्चारण कराना।

  4. D.

    उपरोक्त सभी।

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Correct answer: D

अवधारणा: किसी भी भाषा-शिक्षक—विशेषतः हिन्दी शिक्षक—की व्यावसायिक योग्यता बहुआयामी होती है। भाषा-शिक्षण सिद्धांत के अनुसार, भाषा-दक्षता तीन परस्पर-पूरक (न कि परस्पर-प्रतिस्थापी) आयामों से मिलकर बनती है: (1) संरचनात्मक ज्ञान अर्थात् व्याकरण, (2) विषय-वस्तु/सांस्कृतिक ज्ञान अर्थात् साहित्य, और (3) मौखिक/संप्रेषण-कौशल अर्थात् शुद्ध उच्चारण। एक आदर्श भाषा-शिक्षक में इन तीनों का होना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि इनमें से कोई भी एक अकेला भाषा-शिक्षण के उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता।

प्रयोग (इस प्रश्न पर):

  • व्याकरण का ज्ञान: शिक्षक को वाक्य-रचना, शब्द-रूप, संधि-समास आदि की शुद्ध जानकारी होनी चाहिए, ताकि वह भाषा की मूल इकाइयाँ और नियम ठीक से सिखा सके।

  • साहित्य का ज्ञान: कविता, कहानी, निबंध जैसी विधाओं की समझ शिक्षक को भाषा के सृजनात्मक, सांस्कृतिक और रसास्वादन-संबंधी पक्ष से परिचित कराती है।

  • शुद्ध उच्चारण: विद्यार्थियों को शब्दों का सही उच्चारण करा पाना शिक्षक के मौखिक/वाचिक कौशल और प्रभावी संप्रेषण-क्षमता को दर्शाता है।

चूँकि ये तीनों गुण अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आवश्यक हैं—और कोई भी एक-दूसरे का स्थान नहीं ले सकता—इसलिए एक आदर्श हिन्दी शिक्षक में तीनों गुणों का एक साथ होना अपेक्षित है।

प्रति-जाँच/तुलना: यदि इनमें से कोई एक गुण अनुपस्थित हो, तो शिक्षण में उसका अपना विशिष्ट अभाव प्रकट होता है —

अनुपस्थित गुण

शिक्षण पर परिणाम

व्याकरण का ज्ञान

वाक्य-रचना, संधि-समास आदि की अशुद्धियाँ बनी रहती हैं और भाषा के नियम ठीक से नहीं पढ़ाए जा पाते।

साहित्य का ज्ञान

शिक्षण सांस्कृतिक-सृजनात्मक दृष्टि से अधूरा रह जाता है; विधा-बोध और रसास्वादन विकसित नहीं हो पाता।

शुद्ध उच्चारण

भाषिक ज्ञान सही होने पर भी विद्यार्थियों में गलत उच्चारण की आदत पड़ सकती है।

इस प्रकार प्रत्येक गुण की अनिवार्यता स्वतंत्र रूप से सिद्ध होती है; कोई भी गुण दूसरे का स्थान नहीं ले सकता।

अतः तीनों कथन (व्याकरण-ज्ञान, साहित्य-ज्ञान, शुद्ध उच्चारण) व्यक्तिगत रूप से सत्य एवं आवश्यक हैं, और इन तीनों का समुच्चय ही एक आदर्श हिन्दी शिक्षक की पूर्ण योग्यता को परिभाषित करता है — इसलिए सही उत्तर 'उपरोक्त सभी' है।

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